ख्वाजा साहब के उर्स के लिए न मेला मजिस्ट्रेट मिला और न स्मारिका।

ख्वाजा साहब के भरोसे रहे जायरीन।
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14 अप्रैल को सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का 6 दिवसीय सालाना उर्स धार्मिक दृष्टि से सम्पन्न हो गया। 13 अप्रैल की रात 12 बजे बाद से ही दरगाह में गुसल की रस्म शुरू हो गई थी। सुबह होते होते जायरीन ने अजमेर से लौटना भी शुरू कर दिया। इसी के साथ छठी की रस्म भी पूरी हो गई। हालांकि 15 अप्रैल को जुम्मे की नमाज का महत्त्व बना हुआ है। इसके बाद बड़े कुल की रस्म भी होगी। दरगाह से जुड़े खादिम समुदाय इस बात से संतुट है कि 6 दिवसीय उर्स में कोई अप्रिय वारदात नहीं हुई। इसके लिए ख्वाजा साहब का शुक्रिया अदा किया जा रहा है। जहां तक राज्य सरकार और जिला प्रशासन की जिम्मेदारियों का सवाल है तो शुरू से ही गैर जिम्मेदाराना रवैया सामने आया है। सरकार ने अजमेर के सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर स्थाई नियुक्ति नहीं की, इसलिए ख्वाजा साहब के उर्स में मेला मजिस्ट्रेट नियुक्त नहीं हो पाया। इसे घोर लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना रवैया ही कहा जाएगा कि इस बार मेला मजिस्टे्रट के बिना ही ख्वाजा साहब का उर्स सम्पन्न हो गया। हालांकि जिला कलेक्टर डॉ. आरुषि मलिक ने अपने स्तर पर आरएएस सेवा के जूनियर अधिकारी राधेश्याम मीणा को अतिरिक्त मेला मजिस्ट्रेट नियुक्त कर दिया था। कलेक्टर के इस फरमान की भी जिला प्रशासन में चर्चा है।
अब चूंकि उर्स शांतिपूर्ण सम्पन्न हो गया, इसलिए जूनियर और सीनियर सभी अधिकारी अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। प्रतिवर्ष उर्स के मौके पर जिला प्रशासन की ओर से एक स्मारिका प्रकाशित की जाती है। इस स्मारिका में उर्स के इंतजामों में लगे सभी विभागों के अधिकारियों के नाम और मोबाइल नम्बर अंकित होते हैं। साथ ही उर्स की धार्मिक रस्मों की जानकारियां एवं जायरीन के लिए आवश्यक सूचनाएं भी होती हैं। यहां तक कि विभिन्न मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नवाज की जानकारी भी होती है। पूरे उर्स में यह स्मारिका महत्त्वपूर्ण होती है। विभागों के अस्थाई कैम्प में यह स्मारिका बहुत काम आती है। लेकिन इस बार जिला प्रशासन की ओर से स्मारिका का प्रकाश नहीं हुआ। इससे प्रतीत होता है कि जिला प्रशासन उर्स के इंतजामों को लेकर कितना गंभीर रहा। प्रतिवर्ष उर्स के दौरान दरगाह के अंदर बुलंद दरवाजे के चबूतरे पर जिला प्रशासन का अस्थाई कैम्प लगता है, लेकिन इस बार बुलंद दरवाजे के कैम्प को लेकर भी प्रशासन ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई। अधिकारियों के अभाव में यह कैम्प सूना ही पड़ा रहा। प्रशासन की बेरुखी के चलते कायड़ स्थित विश्राम स्थली पर भी जायरीन को अनेक परेशानी का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उर्स मेले की पहचान कलंदरों ने पीने के पानी को लेकर प्रदर्शन तक किया। जायरीन सुविधाओं को लेकर शिकायत करते ही रहे, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं। सवाल मेला मजिस्ट्रेट का ही नहीं है, बल्कि प्रशासन के अन्य बड़े अधिकारियों का भी है। चूंकि जिला कलेक्टर की ओर से सीनियर अधिकारियों को कोई जिम्मेमदारी नहीं दी गई, इसलिए सीनियर अधिकारी भी बचते नजर आए। इन अधिकारियों ने उस दायरे में ही काम किया जिसका दायित्व दिया गया था। 6 दिवसीय उर्स में प्रशासन में सामूहिक जिम्मेदारी का अभाव पूरी तरह देखा गया।
बिजली से परेशानी:
उर्स के दौरान दिन में कई बार बिजली गुल होने से जायरीन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। बिजली निगम हर वर्ष उर्स से पहले मेंटीनेंस का कार्य करता है,तब दिन भर मेला क्षेत्र की लाईटों को बंद रखा जाता है, लेकिन उर्स के दौरान बार-बार बिजली गुल होने से प्रतीत होता है कि बिजली इंजीनियरों ने भी लापरवाही बरती है।