यह तो रिलायन्स जियो की गुंडाई है। कैंसर अस्पताल के बाहर ही लगाया 4जी का शक्तिशाली टावर।

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यह तो रिलायन्स जियो की गुंडाई है। कैंसर अस्पताल के बाहर ही लगाया 4जी का शक्तिशाली टावर।
राजस्थान में बीच सड़कों पर लगे है जानलेवा ऊंचे और चौड़े टावर।
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देश के प्रमुख हिन्दी दैनिक राजस्थान पत्रिका के अजमेर संस्करण के 20 मई के अंक में द्वितीय प्रथम पृष्ठ पर मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन की एक खबर छपी है। इस खबर में कहा गया है कि 3जी और 4जी के मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन की जांच के लिए सरकार ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिए हैं। यह महत्त्वपूर्ण खबर पत्रिका के मदनगंज-किशनगढ़ के संवाददाता कालीचरण की लिखी हुई है। इसी खबर में किशनगढ़ के यज्ञनारायण चिकित्सालय के रेडिएशन विभाग के प्रमुख डॉ. अशोक कुमार जैन के हवाले से कहा गया है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन से स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां होने की आशंका रहती है। लेकिन इसे रिलायंस जियो की गुंडाई ही कहा जाएगा कि अजमेर में कैंसर अस्पताल के ठीक सामने 4जी का मोबाइल टावर लगा दिया गया है। शर्मनाक बात तो यह है कि यह टावर बीच सड़क पर लगाया गया है। रिलायंस जीयो के मालिक मुकेश अम्बानी से यह पूछने वाला कोई नहीं है कि आखिर कैंसर अस्पताल के सामने ही टावर क्यों लगाया गया है? यानि एक तरफ सरकारी चिकित्सक इन टावरों को कैंसर का रोग बढ़ाने वाला बता रहे हैं तो दूसरी ओर कैंसर अस्पताल के सामने ही टावर लगा दिया गया है। सवाल अकेले अजमेर का नहीं है, पूरे राजस्थान में रिलायंस जियो के टावर बीच सड़कों पर लगे हुए हैं। केन्द्र सरकार ने रिलायंस जियो को राजस्थान में 4जी के नेटवर्क का लाइसेंस दिया है, इसलिए राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार मुकेश अम्बानी के सामने नतमस्तक है। अम्बानी ने ऐसी-ऐसी जगह पर टावर लगाए हैं, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। भले ही इन टावरों से यातायात बाधित हो, लेकिन आम लोगों की सुनने वाला कोई नहीं है। मुकेश अम्बानी ने अपने टावर बीच सड़कों पर लगाने के लिए वसुंधरा राजे की सरकार से एक ऐसा आदेश निकलवा दिया है, जिस पर न्यायालय भी कोई कार्यवाही नहीं करता है। इन टावरों के खिलाफ पीडि़त लोग जब न्यायालय में जाते हैं तो उन्हें स्टे नहीं मिलता है। जो अदालतें छोटे-छोटे मामलों में स्टे दे देती हैं, वे अदालतें ऊंचे ऊंचे टावरों पर आंखे बंद कर बैठी हैं। जहां तक प्रशासनिक अमले का सवाल है तो सरकारी कर्मचारी और अधिकार की तो इन टावरों की ओर देखने की हिम्मत भी नहीं होती। मुकेश अम्बानी के कारिंदे बीच सड़क पर टावर खड़ा करने के बाद स्थानीय निकाय संस्थान को सिर्फ सूचित करते हैं। समझ में नहीं आता कि इस देश का कानून कैसा है। यदि किसी जरुरतमंद युवा को रोजगार के लिए डेयरी का बूथ लगाना होता है तो उसे नगर निगम, डेयरी, जिला कलेक्टर, ट्रेफिक पुलिस आदि से एनओसी लानी होती है। उस गरीब और युवा बेरोजगार को पता है कि बिना रिश्वत दिए इन विभागों से एनओसी नहीं मिलती है। लेकिन मुकेश अम्बानी के सामने इन रिश्वतखोर विभागों की भी घिग्गी बंधी हुई है। थाने के सीआई तो क्या एसपी तक की हिम्मत नहीं कि वह बीच सड़क में खड़े होने वाले 4जी के टावर को रोक सके। यदि कोई गरीब ठेले वाला सड़क के किनारे खड़े होकर फल आदि बेचता है तो पुलिस वाले डंडे मारकर भगा देते हैं, लेकिन यातायात को बाधित कर रहे इन टावरों को कोई नहीं रोक पा रहा। यह माना कि अब इंटरनेट की सुविधा जरूरी है,लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि रिलायंस वाले आम आदमी का जीवन ही खतरे में डाल दें। गत वर्ष रिलायंस जियो का टावर जयपुर में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के घर के बाहर ही खड़ा कर दिया गया था, लेकिन हाईकोर्ट ने सिर्फ अपने चीफ जस्टिस के घर के बाहर से ही टावर को हटवाया।
(एस.पी. मित्तल) (20-05-2016)
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