संसद नहीं चलने पर सांसदों को नहीं मिले वेतन। हंगामा करने वाले भी सदन से बाहर हों।

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7 दिसम्बर को भी लोकसभा और राज्यसभा नहीं चल सकी। सदन में जब पीएम नरेन्द्र मोदी नहीं होते हैं तो उन्हें बुलाने के लिए हंगामा होता है और जब मोदी उपस्थित हो जाते हैं तो नोटबंदी के मुद्दे पर बहस से पहले माफी मांगने की शर्त रख दी जाती है। सात दिसम्बर को भी जब मोदी उपस्थित रहे तो कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने 84 व्यक्तियों की मौत का मामला रख दिया। चूंकि लोकतंत्र में सांसदों को हंगामा करने का अधिकार है, इसलिए दोनों सदनों को स्थगित करने का निर्णय अध्यक्ष और सभापति को लेना पड़ता है। सवाल उठता है कि जब पिछले 15 दिनों से संसद चली ही नहीं है तो फिर सांसदों को वेतन और भत्ते क्यों दिए जा रहे हैं? सांसदों को मासिक वेतन के साथ-साथ संसद सत्र में प्रतिदिन के हिसाब से भत्ते भी मिलते हैं। जनता यह उम्मीद करती है कि जब संसद का सत्र चले तो उनके क्षेत्र का सांसद जन समस्याओं को रखे और समाधान करवाएं। इसके अतिरिक्त देशव्यापी समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया जावे। 8 नवम्बर के बाद से ही आम लोग नोटबंदी की वजह से परेशान हैं। सवाल उठता है कि आखिर इस मुद्दे पर विपक्ष संसद में आवाज क्यों नहीं उठाता? क्या विपक्ष का मकसद सिर्फ संसद को चलने नहीं देना है। अच्छा हो कि विपक्ष संसद में नोटबंदी पर सरकार पर तीखे प्रहार कर आम जनता को राहत दिलवाएं। यदि संसद में बहस नहीं होगी तो फिर नोटबंदी पर सरकार को कैसे कटघरे में खड़ा किया जाएगा? नोट बंदी पर हो रहे हंगामे पर 7 दिसम्बर को वरिष्ठ सांसद लाल कृष्ण आडवाणी ने भी अपनी चिंता जताई है। आडवाणी ने सुझाव दिया है कि संसद नहीं चलने पर सांसदों के वेतन भत्ते में कटौती की जाए और हंगामा करने वाले सांसदों को सदन से बाहर निकाल जाए। आडवाणी ने लोकसभा अध्यक्ष और कुछ मंत्रियों के रवैए पर भी नाराजगी जताई।

(एस.पी.मित्तल) (07-12-16)
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