गुरु पूर्णिमा को धंधा न बनाएं साधु-संत, कथावाचक आदि। गुरु तो देने वाला होता है।

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गुरु पूर्णिमा को धंधा न बनाएं साधु-संत, कथावाचक आदि।
गुरु तो देने वाला होता है।
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9 जुलाई को भारत वर्ष में गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाएगा। भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु का विशेष महत्त्व है। यहां तक की राजा से ऊपर गुरु का पद माना गया है। हमारी सनातन संस्कृति में तो गुरु सबसे बड़ा दानवीर माना गया है। गुरु जो शिक्षा और आशीर्वाद देता है वह बाजार में किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकता। लेकिन आज इसका उल्टा हो रहा है। जिस प्रकार व्यापारी प्रति वर्ष दीपावली पर्व का इंतजार करता है, उसी प्रकार धन कमाने की नीयत से अधिकांश गुरु प्रति वर्ष गुरु पूर्णिमा का इंतजार करते हैं। कोई गुरु दर्शन देने के नाम पर पैसा वसूलता है तो कोई अपना नया आश्राम बनाने के लिए सहयोग मांगता है। जबकि हमारी सनातन संस्कृति में हर वक्त अपने गुरु को सामथ्र्य के अनुरूप कुछ न कुछ देता ही है। इसे कलयुग ही कहा जाता है कि अब गुरु के समक्ष उसी भक्त का ज्यादा महत्त्व होता है, जो गुरु दक्षिणा में मोटी रकम देता है। हमारी संस्कृति में गुरु का महत्त्व आध्यात्म से भी है, लेकिन कलयुग में तो कथावाचक ही गुरु बन गए हैं। इतना ही नहीं इन कथा वाचकों ने अपने नाम से पहले संत शिरोमणि आदि तक की उपाधि लगा ली है। यह सही है कि जीवन में गुरु हमें सही मार्ग दिखाता है, लेकिन अब कैसे-कैसे गुरु आ गए हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। हमारी सनातन संस्कृति में तो गुरु को त्याग और तपस्या की मूर्ति माना गया है। जबकि आज ऐश-ओराम का जीवन व्यतीत करने वाले धंधे बाज भी गुरु बन गए हैं। ऐसे धंधे बाज गुरु हमारी सनातन संस्कृति पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं। कई बार ऐसे गुरुओं की वजह से सम्पूर्ण समाज को वेदना सहन करनी पड़ती है।
महिलाओं का रुझान ज्यादा:
धर्म के प्रति महिलाओं का रुझान ज्यादा होता है, इसलिए साधु संतों के प्रवचनों आदि में महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है। यह मानाकि ऐसे धार्मिक आयोजनों से मानसिक शांति मिलती है, लेकिन यदि कोई महिला अपने परिवार की जिम्मेदारी को भालि भांति निभा रही है तो उसे किसी के भी प्रवचन सुनने की जरुरत नहंी है, क्योंकि वह महिला तो पहले से ही अपना जीवन धर्म के अनुरूप जी रही हैं। इस बार गुरु पूर्णिमा पर सभी गुरुजन इस बात का भी संकल्प लें कि उनका मन हमेशा देना का रहे। भक्तों से लेना वाला व्यक्ति कभी भी गुरु नहीं हो सका।
एस.पी.मित्तल) (08-07-17)
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