आसान नहीं है अध्यात्म और धर्म की राह पर चलना। पूरा जीवन खप जाता है मानव मात्र की सेवा में। अजमेर के सेंट एंसलम और बिजयनगर के सेंट पाॅल स्कूल के प्राचार्यों के धर्म की राह के 25 वर्ष पूरे होने पर विशेष।

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आसान नहीं है अध्यात्म और धर्म की राह पर चलना। पूरा जीवन खप जाता है मानव मात्र की सेवा में। अजमेर के सेंट एंसलम और बिजयनगर के सेंट पाॅल स्कूल के प्राचार्यों के धर्म की राह के 25 वर्ष पूरे होने पर विशेष।
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आज भले ही धर्म की राह पर चल कर अनेक धर्मगुरु ऐशोआराम की जिन्दगी जी रहे हों, लेकिन जो व्यक्ति सही मायने में धर्म की राह पर चल कर मानवमात्र की सेवा करता है, उसका धर्म की राह पर चलना आसान नहीं होता है। इसी भावना से अजमेर के सेंट एंसलम स्कूल के प्राचार्य फादर सुसई मणिक्कम और अजमेर के बिजयनगर स्थित सेंटपाॅल स्कूल के प्राचार्य केन्टियस लिगोरी ने 25 वर्ष पूर्व ईसाई धर्म के अनुरूप पुरोहित बनने की शपथ ली थी। जब युवा मन आसमान की ऊंचाईयों छूने और धन कमाने के लिए तत्पर होता है, तब इन दोनों युवाओं ने चर्च में प्रभु यीशु की मूर्ति के सामने शपथ ली कि अब अपना पूरा जीवन मानव सेवा में खपा देंगे। इस शपथ के बाद कैथोलिक धर्मगुरुओं ने जो निर्देश दिए, उसकी पालना आज तक की जा रही है। काम को कभी छोटा-बड़ा नहीं माना। दोनों ने अपने धर्म की शिक्षाओं पर चल कर लोगों की सेवा की। इन दोनों को पता है कि एक दिन धर्म की इसी मिट्टी में मिल जाना पड़ेगा, लेकिन किसी भी पद पर रहने पर इन्हें घमंड नहीं होता। ईसाई धर्म की परंपराओं के अनुरूप पुरोहित बनने वाले व्यक्ति को अपना घर-परिवार छोड़ना होता है। अंतिम सांस तक चर्च के अधीन काम करने वाली संस्था में रहना होता है। कोई पुरोहित सम्पत्ति का संचय नहीं करता। शिक्षण, चिकित्सा आदि संस्थाओं में काम करने की एवज में जो पारिश्रमिक मिलता है उसे भी चर्च में ही देना होता है। जो पुरोहित अजमेर के सेंट एंसलम स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मुखिया बन जाते हैं, उन्हें कई बार एडमिशन को लेकर आलोचना भी सहनी होती है। कई बार स्कूल में हंगामा भी होता है। ऐसे मौकों पर अध्यात्मिक की शिक्षा ही काम आती है। लाख आलोचनाओं के बाद भी हर अभिभावक चाहता है कि उनके बच्चों का प्रवेश ईसाई शिक्षण संस्थाओं में ही हो। राजनीतिक दलों के नेता कई बार ईसाई शिक्षण संस्थाओं की आलोचना करते हैं, लेकिन ऐसे अधिकांश नेताओं के बच्चे इन्हीं संस्थाओं में पढ़ते हैं। आज ईसाई शिक्षण संस्थाओं का महत्व इसलिए है कि यहां के प्राचार्य धर्म के अनुरूप जीवन यापन करते हैं। हालांकि अब पब्लिक सेक्टर में अन्य निजी स्कूलें भी आ गई हैं, लेकिन देश में कैथोलिक शिक्षण संस्थाओं का अपना महत्व है। यहां अध्ययन करने वाले बच्चे स्वयं को गौरवांवित समझते हैं। अजमेर के सेंट एंसलम स्कूल के प्राचार्य फादर सुसई मणिक्कम ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु में ली और धर्मिक शिक्षा अजमेर में ग्रहण की। पुरोहित बनने के बाद फादर मणिक्कम ने राजस्थान कैथोलिक डायसिस के प्रबंधन का कार्य भी किया। राजस्थान के फालना में नई स्कूल खोलने का श्रेय भी फादर मणिक्कम को ही जाता है। पुरोहित बनने के 25 वर्ष पूरे होने पर फादर मणिक्कम का कहना है कि उनकी परमपिता परमेश्वर से यही इच्छा है कि अंतिम सांस तक सेवा कार्य करुं। उन्होंने कहा कि जब आप मुसीबत में होते हैं तो प्रभु यीशु आपके साथ खड़े होते हैं। उनके जीवन में ऐसे कई मौके आए हैं जब उन्होंने अपने साथ प्रभु यीशु को खड़े देखा है। अध्यात्मिक शक्ति से आप प्रभु के दर्शन भी कर सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य में वो ताकत है जिससे प्रभु के दर्शन हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए। जो व्यक्ति अपने धर्म की राह पर चलता है उसे कभी तकलीफ नहीं होती।
30 नवम्बर को स्कूल परिसर में होगा कार्यक्रमः
फादर सुसई मणिक्कम और फादर केन्टियस लिगोरी के पुरोहित बनने के 25 वर्ष पूरे होने पर 30 नवम्बर को अजमेर के केसरगंज स्थित सेंट एंसलम चर्च परिसर में शाम पांच बजे से आध्यात्मिक धार्मिक आयोजन रखा गया है। इस अवसर पर अजमेर धर्म प्रांत के बिशप पायस थाॅमस डीसूजा, पूर्व बिशप इंगनेशियस मैनेजस, नासिक प्रांत के बिशप लांरडू डेनियल आदि धर्मगुरु उपस्थित रहेंगे। फादर मणिक्कम को मोबाइल नम्बर 9414006022 तथा फादर लिगोरी को 7014178857 पर शुभकामनएं दी जा सकती है। मेरी प्रभु यीशु से प्रार्थना है कि इन दोनों धर्मगुरुओं पर अपनी कृपा बनाए रखें।
एस.पी.मित्तल) (29-11-17)
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