हिन्दू और मुसलमान के यहां मौत मातम एक सा होता है।

हिन्दू और मुसलमान के यहां मौत मातम एक सा होता है।
पिता के निधन पर बेटियां सबसे ज्यादा रोती हैं।
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4 सितम्बर को जब मै। यह ब्लाॅग लिख रहा हंू तब मेरी आंखे नम हैं। मेरे कानों में उन तीन बेटियों के रोने और चिल्लाने की आवाज गूंज रही है जिनका पिता सैय्यद आरिफ चिश्ती का इंतकाल एक दिन पहले तीन सितम्बर को ही हुआ था। कब्र में दफनाने के बाद 4 सितम्बर को अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में आहता-ए-नूर में शोक की फातहा की रस्म हुई। मरहूम आरिफ चिश्ती के बड़े भाई सैय्यद मुनव्वर चिश्ती मेरे भी अच्छे मित्र हैं। हिन्दुओं के अधिकांश धार्मिक समारोह में मुनव्वर भाई दरगाह के प्रतिनिधि के तौर पर उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। इतना ही नहीं हिन्दू साधु संतों धर्म गुरुओं सूफी परंपरा के अनुरूप् दस्तारबंदी भी करते हैं। मुनव्वर भाई की उपस्थिति से ही मौके पर कौमी एकता और सदभावना का माहौल हो जाता है। मुझे जब यह पता चला कि 4 सितम्बर को प्रातः 10बजे दरगाह में मरहूम आरिफ चिश्ती की रूह की शांति के लिए सेम की फातह की रस्म है तो मैं सभी जरूरी कार्यों को छोड़ कर दरगाह पहुंच गया। इस रस्म में मौलवी साहब ने कुरान शरीफ की आयत सुनाई और सभी ने ख्वाजा साहब की मजार के सामने बैठक कर आरिफ चिश्ती के लिए दुआ की। परंपरा के अनुसार इस रस्म के बाद सभी लोग आरिफ चिश्ती के निवास पर पहुंचे। मैंने अपने कानों में मरहूम आरिफ चिश्ती की बेटियों की आवाज सुनी जो अपने पिता को पुकार रही थीं। जिस प्रकार एक हिन्दू परिवार में पिता के निधन पर सबसे ज्यादा बेटियों की पीड़ा सामने आती है। उसी प्रकार मुझे आरिफ चिश्ती के परिवार में भी बेटियों की आवाज सुनाई दी। बेटियों की आवाज में धर्म के कोई मायने नहीं थे। मुझे बताया गया कि आरिफ भाई अपने पीछे तीन बेटियां और दो बेटे और पत्नी छोड़ गए हैं। तीन बेटियों में से सिर्फ एक का निकाह हुआ है।  जिन परिवारों में बेटियां हैं वो आरिफ भाई की बेटियों के दर्द को समझ सकते हैं। मैंने यह भी महसूस किया कि मौत का मातम हिन्दू और मुसलमान के घर एकसा होतो है। अच्छा होता कि आरिफ भाई अपने हाथों से अपने बच्चों का निकाह करते। हालांकि आरिफ चिश्ती का संयुक्त परिवार है और मुनव्वर चिश्ती जैसे बड़े भाई है। इसलिए परिवार के सामने कोई आर्थिक संकट नहीं होगा, लेकिन तीन बेटियों को अपने पिता के नहीं रहने का गम हमेशा रहेगा। जो लोग छोटी छोटी बातों पर हिन्दू-मुसलमान की राजनीति करते हैं उन्हें मौत के मातम से सबक लेना चाहिए।
एस.पी.मित्तल) (04-09-18)
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