राजनीति में कितने झूठे और मक्कार नेता हंै, इसका उदाहरण मध्यप्रदेश में देखने को मिला।

राजनीति में कितने झूठे और मक्कार नेता हंै, इसका उदाहरण मध्यप्रदेश में देखने को मिला।
आखिर कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ढेर हुई।
अब शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनेगी। 

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20 मार्च को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राज्यपाल लालजी टंडन को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफा देने से पहले राजनीति के नाथ ने कहा कि कांग्रेस के 22 विधायकों को बैंगलूरू में बंधक बना लिया था, इसलिए कांग्रेस सरकार ने बहुमत खो दिया। ये वे ही कमलनाथ हैं जिन्होंने 19 मार्च को मीडिया घरानों को इंटरव्यू देकर कहा था कि बैंगलूरू में जो 22 विधायक बंधक हैं उनमें से अनेक उनके सम्पर्क में हैं, इसलिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता। इससे पहले कमलनाथ ने राज्यपाल का आदेश भी मानने से इंकार कर दिया। राज्यपाल के आदेश के बाद ही विधानसभा में बहुमत साबित नहीं किया गया। लेकिन 19 मार्च को जब सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को सायं पांच बजे तक विधानसभा में बहुमत साबित करने का आदेश दिया तो कमलनाथ ने विधानसभा का सामना करने के बजाए राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया। सवाल उठता है कि बैंगलूरू के वो विधायक कहां गए जो कमलनाथ के सम्पर्क में थे? जाहिर है कि 19 मार्च तक कमलनाथ झूठ बोल रहे थे। इतना ही नहीं मध्यप्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति कह रहे थे कि बैंगलूरू वाले विधायक स्वयं उपस्थित होकर इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक इस्तीफे स्वीकार नहीं होंगे। लेकिन उन्हीं प्रजापत ने 19 मार्च की आधीरात को 16 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। ये वो ही प्रजापति हैं जिन्होंने कोरोना वायरस का भय दिखाते हुए राज्यपाल के आदेश की अनदेखी कर विधानसभा को 26 मार्च तक स्थगित कर दिया था। माना तो यही जाता है कि विधानसभा अध्यक्ष झूठ नहीं बोलते और राजनेताओं की तरह मक्कार भी नहीं होते हैं। जहां तक दिग्विजय सिंह का सवाल है तो कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को धराशायी करवाने में इन्हीं की भूमिका है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोडऩे देने से दिग्विजय खुश हैं क्योंकि अब वे अपने बेटे को मध्यप्रदेश की राजनीति में आगे बढ़ा सकेंगे। यहां ज्योतिरादित्य सिंधिया का उल्लेख करना भी जरूरी है। सिंधिया के विधायक पद छोडऩे वाले 22 नेता कांग्रेस के टिकिट पर विधानसभा का चुनाव जीते थे, लेकिन सिंधिया की खातिर ऐसे नेताओं ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। सवाल उठता है कि क्या इन नेताओं ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के साथ धोखा नहीं किया? जिन मतदाताओं ने 5 वर्ष के लिए विधायक चुना वो नेता कौन होते हैं जो विधयक पद से इस्तीफा दे दें? जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया है उनके उपचुनाव होंगे, देखना है कि इस्तीफा देकर कांग्रेस सरकार को गिराने वाले इन नेताओं का क्या हश्र होगा? जहां तक शिवराज सिंह चौहान का सवाल है तो यह सही है कि तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बाद शिवराज भी बगैर सत्ता के छटपटा रहे थे, इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया से मिल कर कमलनाथ की सरकार गिरवा दी। अब देखना है कि शिवराज ने 15 माह में जिन मुद्दों पर कांग्रेस सरकार की आलोचना की, उनका क्या होगा? क्या ज्योतिरादित्य के कहने से शिवराज सिंह मध्यप्रदेश के किसानों के दो लाख रुपए तक के कर्ज माफ कर देंगे? क्या आंदोलन के दौरान जिन किसानों पर मुकदमें दर्ज हुए उनके मुकदमें वापस ले लिए जाएंगे? असल में ऐसी ही मांगों को पूरा नहीं करने पर ही सिंधिया ने कमलनाथ की सरकार गिरवाई है। अब सिंधिया अपना सीना चौड़ा कर कह सकते हैं कि मध्यप्रदेश में उनके समर्थन से भाजपा की सरकार कायम हो गई है। भले ही अभी इसे जल्दबाजी ही कहा जाएगा, लेकिन अब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी वहीं करेगी जो शिवराज और ज्योतिरादित्य की जोड़ी ने किया है।
(एस.पी.मित्तल) (20-03-2020)
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