राजस्थान में भ्रष्ट अफसर रोज हो रहे हैं ट्रेप। फिर भी नहीं हो रहा डर। कुछ तो शर्म महसूस करें रिश्वत खोर।

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15 जून को भी एसीबी ने जयपुर विकास प्राधिकरण के एक राजस्व निरीक्षक सुरेश परेवा को एक लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोप में रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। यह रिश्वत एक प्लाट पर कब्जा दिखाने की एवज में ली जा रही थी। 14 जून को एसीबी ने कोटा टोंक, देवली तथा जमारामगढ़ में कार्यवाही करते हुए 6 रिश्वतखोरों को रंगे हाथों पकड़ा। रिश्वतखोरों के पकड़े जाने का सिलसिला अब राजस्थान में रोजाना हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद भी भ्रष्ट अफसरों और कर्मचारियों में कोई डर नहीं है। जिस तरह से एसीबी रोजाना छापामार कार्यवाही कर भ्रष्टाचारियों को पकड़ रही है, उससे जाहिर हो रहा है कि भ्रष्टाचारियों को डर नहीं है। इससे इस बात का अंदाजा भी लगा लेना चाहिए कि राजस्थान के प्रशासनिक तंत्र में कोई काम बिना रिश्वत के नहीं होता। हर सरकारी कर्मचारी और अधिकारी को सामान्य काम में भी रिश्वत नहीं देते हैं, उनकी फाइलों में विपरीत टिप्पणियां लिख दी जाती है। सरकार अब रिश्वत देने वाले को भी अपराधी बनाने का कानून ला रही है। लेकिन भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र में यदि रिश्वत न दी जाए तो संबंधित व्यक्ति का काम भी नहीं होता है। शर्मनाक बात तो यह है कि जब राजस्थान में वसुंधरा राजे की सरकार के सारे मंत्री और विधायक यह दावा करते हैं कि वे ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं तो फिर अफसरशाही पर अंकुश क्यों नहीं लग रहा? कोई माने या नहीं, लेकिन यह सही है कि लोकतंत्र में यदि सांसद, विधायक और मंत्री ईमानदारी से काम कर लें तो अफसरशाही रिश्वत खाने की हिम्मत नहीं कर सकती है। आम लोगों के जो काम सरकार के नियमों के अंतर्गत होने चाहिए, उन कामों को सांसद और विधायक क्यों नहीं करवाते? असल में विधायकों और मंत्रियों में इतनी नैतिक हिम्मत नहीं है कि वे अफसरों को नियमों के अनुरूप काम करने के लिए मजबूर करें। कई विधायक और मंत्री तो अफसरशाही के आगे गिड़गिड़ाते नजर आते हैं। यदि सांसद, विधायक और मंत्री ईमानदार होकर किसी काम के लिए कहे तो अफसर की इतनी हिम्मत नहीं कि वह रिश्वत मांग ले। दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि मंत्रियों के कहने के बाद भी प्रशासनिक तंत्र में रिश्वत वसूली जाती है। यह माना कि अब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने एसीबी को भ्रष्टाचारियों को पकडऩे की स्वतंत्रता दे दी है, लेकिन सरकार को इस बात पर भी गहनता के साथ विचार करना चाहिए कि आखिर प्रशासनिक तंत्र में इतना भ्रष्टाचार क्यों है?
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(एस.पी. मित्तल) (15-06-2016)
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