अब राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट हो सकता है विपक्ष।
शरद पवार की अहम भूमिका। भाजपा के लिए खतरा भी।

महाराष्ट्र में कांग्रेस, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठबंधन की सरकार बनने पर अब राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष एकजुट हो सकता है। आमतौर पर राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता होने के बाद राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों के तालमेल होता है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र में क्षेत्रीय दलों में एकता हुई है, जिसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ सकता है। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस में तो पहले से ही तालमेल था, लेकिन अब हिन्दुत्व की प्रखर पक्षधर शिवसेना के साथ भी तालमेल हो गया है। महाराष्ट्र में भाजपा को सबक सिखाने के लिए शिवसेना ने अपनी घोर विरोधी पार्टी कांग्रेस और एनसीपी से दोस्ती कर ली है। अब राजनीति में मतभेद वाली बात कोई मायने नहीं रखती है। यदि भाजपा ने शिवसेना का मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के दम पर मुख्यमंत्री का पद हथिया लिया। जब शिवसेना और कांग्रेस में दोस्ती हो सकती है तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी की ममता बनर्जी और कांग्रेस में दोस्ती क्यों नहीं हो सकती? दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने गत लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के साथ दोस्ती के प्रयास किए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। अब जनवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगे। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तसीगढ़, पंजाब आदि बड़े राज्यों में पहले से ही कांग्रेस की सरकारें हैं। महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ, उससे कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी। महाराष्ट्र के घटनाक्रम से तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है क्योंकि मोदी ने प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए 23 नवम्बर की सुबह पांच बजे महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी। सवाल उठता है कि जब बहुमत का भरोसा नहीं था, तब देवेन्द्र फडऩवीस को शपथ क्यों दिलवाई गई? एक तरफ यह प्रचारित किया जाता है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह राजनीति के चाणक्य हैं और विदेश में भी तोडफ़ोड़ कर सरकार बनवा सकते हैं तो दूसरी ओर अजीत पवार की हैसियत का अंदाजा ही नहीं लगा सके। भाजपा को अब अजीत पवार के भरोसे सरकार बनाने के निर्णय पर मंथन करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी और अमितशाह भले ही नहीं माने लेकिन महाराष्ट्र के घटनाक्रम से काफी नुकसान हुआ है। पहले कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के बोल्ड निर्णय और फिर अयोध्या में मंदिर निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नरेन्द्र मोदी की सरकार को जो वाह वाही मिली, उस पर महाराष्ट्र के घटनाक्रम ने प्रतिकूल असर डाला है। एक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि उन्हें सत्ता का कोई लालच नहीं है। वे तो फकीर हैं, जब मन करेगा, तब झोला उठा कर चल देंगे। लेकिन ये ही नरेन्द्र मोदी एक ही रात में महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटवाने की वैधानिक प्रक्रिया पूरी करवाते है। जब सत्ता का लालच नहीं है तो रात के अंधेरे में सरकार के गठन की प्रक्रिया क्यों की गई? जिन अजीत पवार को जेल में डालने की बात की जा रही थी, उन्हीं अजीत पवार के साथ सरकार बना ली। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में आज भी नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता है। आम लोग मानते हैं कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने का बोल्ड फैसला मोदी ही कर सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी ने भारत का सम्मान बढ़ाया है। ऐसे में मोदी को अपनी छवि का ख्याल भी रखना होगा। यदि महाराष्ट्र जैसी घटनाएं होंगी तो उन तत्वों को बल मिलेगा जो इस देश को तोडऩा चाहते हैं। भारत जैसे देश को कमजोर करने के लिए आजादी के बाद से ही षडय़ंत्र हुए हैं।
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