मुसलमान इस गलत फहमी में न रहे कि रमजान में रोजे रखने और हज व उमरा करने से गुनाह माफ हो जाएंगे। धर्म की यह सच्चाई सभी धर्मों के इंसानों पर लागू होती है।
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अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के प्रमुख खादिम सैय्यद अब्दुल गनी गुर्देजी ने 31 मई को मुझे एक मुस्लिम विद्वान का वीडियो भेजा। आमतौर पर मुस्लिम धर्मगुरु और विद्वान सवालों के जवाब देते हैं। ऐसे ही एक सवाल के जवाब में मुस्लिम विद्वान का कहना रहा कि मुसलमानों को यह गलत फहमी है कि किसी का हक मारने, कम तौलने, मिलावट करने, धोखा देने, फरेब करने, झूठ बोलने, किसी को प्रताड़ित के बाद रमजान में रोजा रखने, हज और उमरा करने से गुनाहों की माफी मिल जाती है। असल में हमारे धर्म शिक्षक कुछ ऐसा बताते हैं, लेकिन यह सच्चाई नहीं है। रमजान में रोजा रखने, हज और उमरा करने से वो ही गुनाह माफ होते हैं जो खुदा और बंदे के बीच के हैं। जैसे नियमित नमाज न पढ़ना, किसी कारण से रमजान में रोजे न रखना, जुम्मे की नमाज अदा न करना, खुदा ऐसे गुनाहों की ही माफी देता है तो फिर यह मसला आपके और पीड़ित बंदे के बीच का है। बंदे के साथ किए गुनाह की माफी तो संबंध्ंिात बंदा ही दे सकता है। इसके लिए बंदे से ही माफी मांगनी होगी। वीडियो में मुस्लिम विद्वान का कहना रहा कि बंदे के साथ गुनाह की माफी खुदा से मांगने वाली बात जोर शोर से फैलाई जाती है, इसलिए लोग रोजा भी रख रहे हैं और हज व उमरा भी कर रहे हैं। जिस दिन मुसलमानों की गलतफहमी दूर हो जाएगी, उस दिन गुनाह भी नहीं होंगे। गनी गुर्देजी द्वारा भेजा गया प्रेरणादायक यह वीडियो मेरे फेसबुक पेज www.facebook.com/SPMittalblog पर देखा जा सकता है साथ ही मोबाइल नम्बर 9829071897 पर गनी गुर्देजी का शुक्रिया अदा भी किया जा सकता है। गुर्देजी ने अनेक धार्मिक पुस्ताकों का अध्ययन किया है। विचार बहुत ही स्पष्ट और सटीक है।
सभी धर्मों के इंसानों पर लागूः
मुस्लिम विद्वान ने अपने धर्म के अनुरूप शिक्षा दी है, वह सभी धर्मों के इंसानों पर लागू होती है। किसी इंसान के साथ बेईमानी या अपराध करने के बाद मंदिर में पूजा अर्चना या गिरजाघर में प्रार्थना करने से माफी नहीं मिलेगी। भले ही आप पहाड़ी पर बने किसी मंदिर में चले जाए या फिर घर पर किसी भगवान की कथा करा लें। आपने इंसान के साथ जो अपराध किया है उसकी सजा तो मिलेगी ही। यदि कोई धर्मगुरु या संत महात्मा किसी इंसान के गुनाहों की माफी दिलवाने का दावा करता है तो वह अपने धर्म के अनुरूप आचरण नहीं कर रहा है। मंदिरों में जाने, कथा कराने, व्रत रखने आदि से उन्हीं अपराधों में माफी मिलेगी जो ईश्वर से ताल्लुक रखते हैं। मेरा मानना है कि धर्म कोई भी हो, वह गलत शिक्षा नहीं देता। कई बार धर्म को मानने वाले अपने नजरिए से व्याख्या कर देते हैं, जिससे पूरे समाज को नुकसान होता है। उम्मीद है कि मुस्लिम विद्वान की बातों को सभी इंसान समझने की कोशिश करेंगे।
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