डोटासरा, सचिन पायलट की तरह शालीन नहीं जो अशोक गहलोत की हर करतूत को बर्दाश्त कर लें। 6 साल में पहला अवसर जब डोटासरा ने गहलोत पर सीधा हमला किया। मालवीय को भी राजनीतिक हैसियत दिखाई। चौथी बार गहलोत सरकार के नारों को क्यों नहीं रुकवाते पूर्व मुख्यमंत्री? ============== राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सार्वजनिक तौर पर अनेक बार पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट के विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग किया, लेकिन हर बार पायलट ने शालीनता दिखाई और कहा कि गहलोत उनके पिता के समान है। पायलट ने कभी भी गहलोत को लेकर अभद्र टिप्पणी नहीं की। लेकिन गहलोत को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से पायलट जैसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। 30 जुलाई को जब कांग्रेस नेता महेंद्र जीत सिंह मालवीय अपने समर्थकों को लेकर पहले अशोक गहलोत के जयपुर आवास पर चले गए तो डोटासरा ने मीडिया के कैमरों के सामने गहलोत पर सीधा हमला किया। इतना ही नहीं गहलोत समर्थक मालवीय को उनकी राजनीतिक हैसियत भी दिखा दी। डोटासरा गत 6 वर्षों से प्रदेशाध्यक्ष है, लेकिन यह पहला अवसर है, जब डोटासरा ने गहलोत के कृत्य पर नाराजगी जताई। असल में मालवीय अपने गृह क्षेत्र बांसवाड़ा डूंगरपुर से 300 कार्यकर्ताओं को लेकर जयपुर आए और वादा किया कि यह सभी भारत आदिवासी पार्टी के कार्यकर्ता है और आम कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा को उम्मीद थी कि मालवीय कार्यकर्ताओं को सीधे प्रदेश कार्यालय में लाएंगे और फिर कांग्रेस की सदस्यता दिलाई जाएगी, लेकिन मालवीय कार्यकर्ताओं को लेकर पहले पूर्व सीएम गहलोत के सिविल लाइन स्थित सरकारी आवास पर पहुंच गए। यहां सभी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस का दुपट्टा पहनाया गया। मालवीय ने कहा कि हम सब अशोक गहलोत के साथ है। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं ने अशोक गहलोत की मौजूदगी में ही चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। मालवीय की इस कार्यवाही से जाहिर था कि उनका समर्पण जब चौथी बार गहलोत सरकार के नो लगा रहे है, तब कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में अध्यक्ष डोटासरा इंतजार कर रहे थे। डोटासरा को मालवीय का यह व्यवहार गलत लगा कि वे प्रदेश कार्यालय आने के बजाए पहले गहलोत के आवास पर चले गए। मालवीय जब अपने समर्थकों के साथ प्रदेश कार्यालय आए तो डोटासरा ने मीडिया के कैमरों के सामने नाराजगी जताई। डोटासरा ने मालवीय से कहा कि आप तो किसी नेता की ब्रांडिंग करने आए हैं, जबकि आपको पता है कि कांग्रेस को मजबूत करने का काम करना चाहिए। डोटासरा ने कहा कि व्यक्तिवादी राजनीति के कारण कांग्रेस को पहले ही काफी नुकसान हो चुका है। डोटासरा ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट का नाम लेते हुए कहा कि मैं हमेशा कांग्रेस को मजबूत करने का करता हूं, मैंने कभी भी अपने नाम की ब्रांडिंग नहीं करवाई। डोटासरा ने मालवीय से कहा कि कांग्रेस में आ मुझसे वरिष्ठ है, लेकिन आज आम मेरे पीछे खड़े है। मालवीय को यह नहीं भुलना चाहिए कि जब उन्होंने वर्ष 2024 में बांसवाड़ा डूंगरपुर संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था, तब मैंने चुनौती देकर मालवीय को हरवाया। आज मालवीय न सांसद है और न विधायक। यानी डोटासरा ने गहलोत पर हमला करने के साथ साथ मालवीय को भी राजनीतिक हैसियत दिखा दी। डोटासरा ने 30 जुलाई को जिस अंदाज में अपनी नाराजगी जताई, उसको लेकर अब राजस्थान में कांग्रेस का माहौल गर्म हो गया है। एक ओर कांग्रेस शहरी निकाय और पंचायती राज के चुनावों की तैयारियां कर रही है, तो वहीं प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा और पूर्व सीएम गहलोत के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। हालांकि डोटासरा की नाराजगी पर गहलोत ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन गहलोत को भी एहसास हो गया है कि डोटासरा, पायलट की तरह शालीनता नहीं दिखाएंगे। डोटासरा ने जो नाराजगी दिखाई उसे देखते हुए भविष्य में कांग्रेस का कोई नेता शायद ही अशोक गहलोत से इस तरह मुलाकात करे। नारों को रोकते क्यों नहीं?: मालूम हो कि गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। चूंकि राजस्थान में गत पांच बार से एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की सरकार बन रही है। इसलिए गहलोत की लालसा है कि वर्ष 2028 में जब कांग्रेस सरकार बने तो वे चौथी बार मुख्यमंत्री बन जाए। यही वजह है कि गहलोत के समर्थक चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाते हैं। यदि गहलोत की लालसा न हो तो वे अपने समर्थकों को ऐसे नारे लगाने से मना कर रोक सकते हैं। जानकारों की मानें तो कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व पर दबाव डालने के लिए गहलोत चौथी बार के बारे लगाते हैं। 30 जुलाई को भी मालवीय के समर्थकों ने गहलोत के घर पर चौथी बार के नारे लगाए तो साफ प्रदर्शित हो रहा था कि इन नारों में गहलोत की सहमति है। सत्ता के बगैर छटपटाहट: महेंद्र जीत सिंह मालवीय लाखों रुपया खर्च कर 300 कार्यकर्ताओं को जयपुर इसलिए लाए ताकि कांग्रेस में उनका प्रभाव बढ़ सके, लेकिन मालवीय का यह दांव उल्टा पड़ गया। असल में मालवीय सत्ता के बगैर छटपटा रहे हैं। मालवीय ने कांग्रेस में रहते हुए बरसो तक सत्ता का सुख भोगा। वे स्वयं सांसद, विधायक और मंत्री रहे। जब वे कांग्रेस की गहलोत सरकार में मंत्री थे, तो अपनी पत्नी रेशमा मालवीय को जिला प्रमुख बनवा दिया। कांग्रेस में इतना सुख भोगने के बाद मालवीय ने वर्ष 2024 में भाजपा का दामन थाम लिया। लेकिन भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मालवीय लोकसभा का चुनाव हार गए। इतना नहीं मालवीय बागीदौरा उप चुनाव में अपने साले को भाजपा का उम्मीदवार बनवाया। साला भी चुनाव हार गया। इसी वर्ष जनवरी माह में मालवीय ने भाजपा छोड़कर फिर से कांग्रेस जॉइन कर ली। मौजूदा समय में मालवीय और उनके परिवार का कोई भी सदस्य सांसद, विधायक, जिला प्रमुख नहीं है। पंचायती राज के चुनाव को देखते हुए मालवीय की नजर डूंगरपुर के जिला प्रमुख के पद पर लगी हुई है। वहीं भारत आदिवासी पार्टी की ओर से दावा किया गया है कि मालवीय के साथ जो 300 कार्यकर्ता जयपुर गए है उनका हमारी पार्टी से कोई संबंध नहीं है। ये वे ही लोग है जिने मालवीय भाजपा में ले गए थे। S.P.MITTAL BLOGGER ( 31-07-2026) Website- www.spmittal.in Facebook Page- www.facebook.com/SPMittalblog Follow me on Twitter- https://twitter.com/spmittalblogger?s=11 Blog- spmittal.blogspot.com To Add in WhatsApp Group- 9166157932 To Contact- 9829071511

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